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सिद्धार्थनगर: ट्रामा सेंटर बना संचालन नहीं, रेफर हो रहे गंभीर मरीज

माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज परिसर में एक साल पहले बना ट्रामा सेंटर अभी तक नहीं हो पाया शुरू प्रतिदिन हार्ट अटैक, गंभीर इंजरी व क्रिटिकल ऑपरेशन के मरीज हो रहे हैं रेफर सरकार की ओर से बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने की योजना जिले में दम तोड़ रही है। ट्रामा सेंटर तो बना, लेकिन एक साल बाद भी संचालन न होने से गंभीर मरीजों को लखनऊ, गोरखपुर और निजी अस्पताल में जाना पड़ रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो 5 से 10 मरीज प्रतिदिन ऐसे रेफर हो हैं, जिनका इलाज यहां पर मुमकिन है, लेकिन व्यवस्था को चलाने वालों को शिथिलता का खमियाजा आम जनता भुगत रही है। अगर ट्रॉमा सेंटर संचालित होता तो हादसे के शिकार, गंभीर, अटैक और क्रिटिकल सर्जरी योग्य मरीजों का बाहर नहीं जाना पड़ता, उनका इलाज यहां पर संभव रहता।

मौजूदा समय में जनपद की आबादी तरीबन 30 लाख के करीब पहुंच चुकी है। स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए जिला अस्पताल था। जिसमें सुविधाएं नाकाफी थीं। रोगियों को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज और निजी अस्पताल में जाना पड़ता था। मरीजों को जिले में ही बेहतर इलाज हो सके, इसके लिए जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज में तब्दील कर दिया गया। इसके बाद मरीजों की तादाद भी बढ़ गई। स्थिति यह है कि पहले 500- 800 की ओपीडी थी जो बढ़कर 1200-1500 तक पहुंच गई। इसी प्रकार इमरजेंसी में भी मरीजों की संख्या बढ़ गई कि मेडिकल कॉलेज में सुविधाएं मिलेंगी। मेडिकल कॉलेज बनने के बाद जांच की सुविधाएं बढ़ी। गंभीर रोगियों का यहीं पर इलाज हो सके।इसके लिए सीएसआर प्रोजेक्ट से ट्रामा सेंटर बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। लगभग चार करोड़ के लागत से ट्रॉमा सेंटर और उसके संसाधन की खरीद करके संचालित किया जाना था। भवन तो एक वर्ष पहले ही बनकर हैंडओवर हो गया, लेकिन सेंटर आज भी नहीं शुरू हुआ। जबकि, कई चिकित्सक भी आ गए हैं जो ऑपरेशन करने और केस का हैंडल करने में माहिर हैं। लेकिन सुविधा न होने के कारण व मरीजों को रेफर कर देते हैं।

गंभीर रोगियों को आज भी गोरखपुर, लखनऊ और निजी अस्पताल का सरण लेना पड़ा है। अगर उसका संचालन शुरू होता तो मरीजों को लाभ मिलता। जो जिम्मेदारों की शिथिलता के कारण शुरू नहीं हो पा रहा है। नगर के निवासी रामकेश यादव, चंद्रभान तिवारी, महेश ने कहा कि मेडिकल कॉलेज बनने से लगा कि लाभ मिलेगा। लेकिन आज भी गंभीर मरीजों को लेकर बाहर जाना पड़ता है। क्योंकि हादसे के शिकार होने पर तत्काल यह कहते हुए रेफर कर दिया जाता है कि ट्रामा सेंटर की सुविधा नहीं हैप्रतिदिन रेफर हो रहे इतने मरीज

 

अस्पताल की इमरजेंसी के आंकड़ों पर गौर करें तो 24 घंटे में 5 से 10 मरीज ऐसे आते हैं, जिन्हें सुविधा न होने के कारण रेफर करना पड़ता है। इसमें सबसे अधिक हेडइंजरी के होते हैं। इसके अलावा गंभीर अटैक वाले मरीज। क्रिटिकल सर्जरी वाले, जिन्हें ट्रामा सेंटर में रखा जा सकता है। किसी- किसी दिन हादसे होने के बाद संख्या और बढ़ जाती है। ऐसा नहीं है कि सर्जरी नहीं हो सकती है, लेकिन सर्जरी के बाद मरीजों को रखे जाने की सुविधा न होने के कारण इलाज संभव होते हुए भी डॉक्टर उन्हें रेफर कर देते हैं।

 

 

ट्रामा सेंटर चले तो हो जाए वेंटीलेटर का उपयोग

 

कोरोना काल में खरीदे गए वेंटिलेटर पड़े हुए हैं। उसका उपयोग भी नहीं हो रहा है। अगर ट्रामा सेंटर शुरू हो तो इनका उपयोग किया जा सकता है। सेंटर भी संचालित हो जाता और मरीजों को लाभ भी मिलता।

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